विवेक का परिवार बिहार छोड़कर पंजाब के एक कस्बे में बस गया था, जहाँ उसके पिता मछलियों का व्यापार करते थे。 परिवार में माता-पिता के अलावा तीन भाई और एक बहन थी।
- बचत की चोरी: परिवार ने शादियों के लिए 20,000 रुपये जोड़े थे, जो उस समय एक बड़ी रकम थी।
- चोरी का शक: एक फंक्शन से लौटने पर घर के पैसे गायब मिले। विवेक के पिता को शक था कि चोरी आसपास के किसी रिश्तेदार ने ही की है。
गुरुमाँ की सहायता और विवाद
विवेक के पिता एक ‘गुरुमाँ’ के पास गए, जिन्होंने बताया कि चोरी किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं बल्कि उनके करीबियों ने ही की है।
- चोर का सामना: जब पिता उन रिश्तेदारों को गुरुमाँ के पास ले गए, तो गुरुमाँ ने सीधे तौर पर एक व्यक्ति को पहचान लिया।
- झूठा आरोप: पकड़े जाने के डर से उस रिश्तेदार ने खुद ही विवेक के पिता पर चोरी का झूठा आरोप लगा दिया, जिससे पुलिस केस भी हुआ।
- तंत्र-मंत्र की शुरुआत: विवाद इतना बढ़ गया कि उन रिश्तेदारों ने विवेक की माँ पर ‘मारण क्रिया’ (एक प्रकार का काला जादू) करवा दी。
माँ की बीमारी और अलौकिक शक्तियां
माँ की तबीयत बहुत खराब रहने लगी। डॉक्टरों के पास कोई इलाज नहीं था क्योंकि रिपोर्ट में कुछ नहीं आता था。
- सिद्ध पुरुष से मुलाकात: परिवार माँ को एक सिद्ध पुरुष के पास ले गया। वहाँ माँ के भीतर की रूहानी शक्तियां (Entities) बाहर आईं और उस सिद्ध पुरुष को चुनौती देने लगीं।
- 7-8 आत्माएं: उस पुरुष ने बताया कि माँ के शरीर के भीतर एक नहीं बल्कि सात-आठ अलग-अलग रूहें हैं, जिन्हें उनके रिश्तेदारों ने भेजा है।
- गुरु जी का हस्तक्षेप: अंततः वे माँ को एक बड़े ‘गुरु जी’ के पास ले गए। गुरु जी ने अपनी शक्तियों और मशालों वाली रूहानी फौज के दम पर उन बुरी शक्तियों को डराया।
- काट: गुरु जी ने माँ की मारण क्रिया की काट की और एक सुरक्षा कवच (ताबीज) दिया।
बिहार में शादी और दोबारा संकट
गुरु जी की सलाह पर परिवार कुछ समय के लिए रिश्तेदारों से दूर बिहार चला गया。 वहाँ विवेक के बड़े भाई प्रदीप की शादी तय हुई।
- जहरीला पान: बिहार पहुँचते ही एक पुराने दुश्मन रिश्तेदार ने धोखे से प्रदीप को पान खिला दिया।
- पुलिया पर घटना: शादी के बाद जब विदाई हो रही थी, तो रास्ते में एक पुलिया पर नई दुल्हन अचानक किसी शक्ति के प्रभाव में आ गई। उस रूहानी शक्ति ने ‘लड्डू’ की मांग की, जिसे खिलाने के बाद वह शांत हुई।
- ताबीज का टूटना: रास्ते में ही माँ के गले का ताबीज अचानक किसी अदृश्य शक्ति ने तोड़कर फेंक दिया, जो इस बात का संकेत था कि दुश्मन हार नहीं मान रहे थे।